Wednesday, June 12, 2013

अशोक कैंथ के प्रयास रंग लाए

चित्रकार द्वारा बनायी अशोक वाटिका की एक काल्पनिक झांकी

और यह है श्रीलंका के सीता एलिया गांव में अशोक वाटिका का बाहरी दृश्य


मंदिर में जीर्णोद्धार कार्य चल रहा है
                                       

जिस तरह पवनपुत्र हनुमान को माता सीता जी की खोज-खबर लाने के लिए सात योजन समुद्र लांघना पड़ा और राक्षसों से लोहा लेना पड़ा था, ठीक उसी प्रकार श्रीलंका स्थित माता सीता जी स्मृति स्थली को विधर्मियों से मुक्त करवाने के लिए पंजाब के धर्मनिष्ठ पुत्र श्री अशोक कैंथ को अनेक बाधाओं को लांघना पड़ा। उनके प्रयासों व श्रीलंका सरकार के सहयोग से आज रावण की अशोक वाटिका सनातनधर्मियों के अधिकार क्षेत्र में है। वहां स्थित प्राचीन मंदिर के पुनरुद्वार का काम भी शुरू हो चुका है। अब तक प्रचार से दूर चुपचाप तरीके से अशोक वाटिका मुक्ति के कार्य में लगे श्री कैंथ ने पहली बार मीडिया के सामने इसका खुलासा किया ताकि अभी तक लगभग गुमनाम रहे इस तीर्थ का पुण्य दुनिया के लोग भी उठा सकें। अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी "नासा" द्वारा खोजे गए राम सेतु के बाद अब श्री कैंथ द्वारा खोजे गए साक्ष्यों से रामायण की प्रमाणिकता को और बल मिला है।
उल्लेखनीय है कि श्रीलंका स्थित अशोक वाटिका वह तीर्थस्थान है जहां पर हरण के बाद लंकापति रावण ने माता सीता को बंदी बनाकर रखा था। हर्ष की बात है कि यह स्थल आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है और यहां माता सीता के अतिरिक्त महाबली हनुमान द्वारा की गई लीलाओं के कई चिन्ह भी मौजूद हैं। इस स्थल के बारे में स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त बहुत कम लोग इसके बारे में जानकारी रखते हैं।
पंजाब में फगवाड़ा नगर के पास छोटे से कस्बे बंगा के निवासी श्री अशोक कैंथ लगभग 15 साल पहले कुवैत गए और वहां न्याय मंत्रालय के तहत इलेक्ट्रिक सुपरवाइजर की नौकरी की। नवम्बर 2004 में वह कुवैत से भारत पहुंचे। वे कुछ दिनों के लिए बीच में श्रीलंका में भी रुके थे। यहां उनके मन में विचार कौंधा कि हो न हो यह श्रीलंका वही रावण की लंका है जिसका वर्णन रामायण में किया गया है। उनमें रामायणकालीन जानकारियां व स्थल खोजने की जिज्ञासा पैदा हुई। वे कोलंबो स्थित नटराजन मंदिर के पुजारी स्वामी रामटीक से मिले और उन्होंने माता सीता जी के चरणों से पावन हुई अशोक वाटिका व अन्य पौराणिक स्थलों की चर्चा की। स्वामी जी ने उनको अशोक वाटिका के बारे में बताया। उसके बाद श्री कैंथ अशोक वाटिका के बारे में अधिक जानने के लिए लगभग ग्यारह बार श्रीलंका गए और आखिरकार उस जगह पहुंच ही गए जहां राक्षसी त्रिजटा ने माता सीता की धर्ममाता का कर्तव्य निभाया था। यह स्थान कोलंबो से कैंडी शहर की ओर जाने वाली सड़क पर दो सौ किलोमीटर दूर स्थित नुआर एलिया नामक कस्बे से सात किलोमीटर पश्चिम में सीता एलिया के नाम से जाना जाता है। इस जगह पर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में एक प्राचीन मंदिर है जिसे स्थानीय भाषा में सीता अम्मा कोविल (सीता माता का मन्दिर) कहते हैं। वर्णन मिलता है कि अशोक वाटिका बहुत मनोरम थी और यह बात आज भी सत्य साबित होती है। यहां आज भी चारों ओर प्रकृति के मनोरम दृश्य हैं। पहाड़ी क्षेत्र में स्थित अशोक वाटिका चारों ओर से सुगंधित पेड़ों-लताओं से घिरी है और यहां बेहद दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। परन्तु मंदिर की दुर्दशा को देखकर व्यथित मन से श्री कैंथ भारत लौटे और तब उन्होंने संकल्प किया कि वे मंदिर का पुनरोद्धार अवश्य करवाएंगे। इस काम में सहयोग के लिए उन्होंने भारत आकर देश के गण्यमान्य लोगों, जैसे- श्री अशोक सिंहल, श्री केदारनाथ साहनी, श्री विष्णु हरि डालमिया, श्री अमिताभ बच्चन, सूर्या रोशनी के स्वामी श्री बी.डी. अग्रवाल, मुगल महल होटल श्रृंखला के श्री अशोक कालड़ा, कनाडा मूल के कुवैत स्थित उद्योगपति श्री अशोक कुमार कैंथ, फिल्मी सितारों, संतों-महात्माओं, लेखकों, विद्वानों, समाचार पत्रों के संपादकों को पत्र लिखे। उनको इन पत्रों का सकारात्मक उत्तर मिला।
श्री कैंथ ने अपने इस उद्देश्य के लिए श्रीलंका के सेंट्रल प्रोविंस के मुख्यमंत्री श्री राधाकृष्ण और कृषि मंत्री श्री मुत्थु शिवलिंगम से चर्चा की जो काफी सकारात्मक रही। श्री कैंथ को बताया गया कि श्रीलंका सरकार ने इस मंदिर के लिए 1996 में एक न्यास की स्थापना की थी, परन्तु धनाभाव के कारण पुनरोद्धार का काम शुरु नहीं हो पाया है। लेकिन श्रीलंका के उक्त राजनेताओं ने मंदिर निर्माण में हरसंभव सहायता व सहयोग देने का आश्वासन दिया। विगत वर्ष इस संबंध में श्री कैंथ श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री महेंद्र राजपक्षे से भी मिले और उनको मंदिर निर्माण संबंधी जानकारी दी। वहां भारतीय राजदूत श्रीमती निरुपमा राव ने भी श्री कैंथ को हरसंभव सहायता देने का आश्वासन दिया। राजनीतिक आश्वासन के बाद भी श्री कैंथ के इस पुण्य कार्य में सभी बाधाएं दूर नहीं हुई थीं, क्योंकि इस मंदिर पर वहां के मुस्लिम समुदाय का कब्जा था और वे वहां मांस-मदिरा का सेवन कर हर रोज मंदिर की पवित्रता भंग करते थे। इसके अलावा भी वहां की 46 से अधिक ईसाई व अन्य संस्थाओं ने मंदिर पुनरोद्धार के काम का यह कहकर विरोध करना शुरु कर दिया था कि इससे क्षेत्र में हिन्दुत्व को प्रोत्साहन मिलेगा। श्री कैंथ घबराए नहीं और धीरे-धीरे सभी बाधाओं को पार कर लिया गया। आज मंदिर पुनरोद्धार का काम जारी है। श्री कैंथ के अनुसार संभवत: आने वाले नवरात्रों में ही बंगा कस्बे में विशाल समारोह आयोजित करके मंदिर के लिए देव प्रतिमाएं भेजी जाएंगी। इस कार्यक्रम में श्रीलंका के सेंट्रल प्रोविंस के मुख्यमंत्री श्री राधाकृष्ण या कृषि मंत्री श्री मुत्थु शिवलिंगम पधारेंगे और प्रतिमाएं उन्हें सुपुर्द की जाएंगी। इसके लिए बंगा में श्री अशोक वाटिका (श्रीलंका) धार्मिक व्यवस्था सुधार कमेटी का गठन किया गया है, जिसमें स्वामी कृष्णानंद जी बीनेवाल को अध्यक्ष, श्री अशोक कैंथ को संयोजक, बाबा देवेन्द्र कौड़ा व शिव कौड़ा को प्रबंधक बनाया गया है। कार्यक्रम की रूपरेखा राज्य के जाने-माने राष्ट्रवादी पत्रकार डा. जवाहर धीर तैयार कर रहे हैं। सीता अम्मा कोविल मंदिर परिसर में रहने वाली दस महिलाओं को उद्योगपति श्री अशोक कुमार कैंथ द्वारा मासिक पेंशन देने की घोषणा की गई है और मंदिर में प्रसाद के लिए मुगल होटल समूह के प्रमुख श्री अशोक कुमार कालड़ा ने पांच सालों के लिए अनुबंध किया है।

Wednesday, June 5, 2013

हम भारतीय, सिकंदर?? को सिकंदर महान क्यों माने

हम भारतीय, सिकंदर ?? को सिकंदर महान क्यों माने

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वकन्क्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने इरान पर आक्रमण किया,इरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता । गोर्दियास को जीतने के बाद टायर को नष्ट कर डाला। बेबीलोन को जीतकर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया।

सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था । वह अपने को इश्वर का अवतार मानने लगा,तथा अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। परंतु भारत में उसका वो मान मर्दन हुआ जो कि उसकी मौत का कारण बना।

सिन्धु को पार करने के बाद भारतt के तीन छोटे छोटे राज्य थे। १--,ताक्स्शिला जहाँ का राजा अम्भी था। २--पोरस। ३--अम्भिसार ,जो की काश्मीर के चारो और फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था,इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने भी तठस्त रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, परंतु भारतमाता के वीर पुत्र पुरु ने सिकंदर से दो-दो हाथ करने का निर्णय कर लिया। आगे के युद्ध का वर्णन में यूरोपीय इतिहासकारों के वर्णन को ध्यान में रखकर करूंगा। सिकंदर ने आम्भी की साहयता से सिन्धु पर एक स्थायी पुल का निर्माण कर लिया।
प्लुतार्च के अनुसार,"२०,००० पैदल व १५००० घुड़सवार सिकंदर की सेना पुरु की सेना से बहुत अधिक थी,तथा सिकंदर की साहयता आम्भी की सेना ने भी की थी। "

कर्तियास लिखता है की, "सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेहलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए। "
बाकि बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से ६० किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

एरियन लिखता है कि,"भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे 'बुसे फेलास 'को मार डाला।"
ये भी कहा जाता है की पुरु के हाथी दल-दल में फंस गए थे,तो कर्तियास लिखता है कि,"इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। ----------------अनेको विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शास्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिड़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया।"
वह आगे लिखता है कि,"सर्वाधिक ह्रदयविदारक द्रश्य यह था कि, यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिको को अपनी सूंड सेपकड़ लेता व अपने महावत को सोंप देता और वो उसका सर धड से तुंरत अलग कर देता। --------------इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता,और युद्ध चलता ही रहता। "
इसी प्रकार दियोदोरस लिखता है की,"हाथियों में अपार बल था,और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर-चूर कर दिया।
कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर को अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रक्खा था। परन्तु सिकंदर ने भयातुर उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले श्री इ० ए० दब्ल्यु०बैज लिखते है की,"जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखूँगा,तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा।अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वद्ध नही किया। इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए,और सिकंदर ने पुरु को अन्य प्रदेश जीतने में सहायता की"।
बिल्कुल साफ़ है की प्राचीन भारत की रक्षात्मक दिवार से टकराने के बाद सिकंदर का घमंड चूर हो चुका था। उसके सैनिक भी डरकर विद्रोह कर चुके थे । तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी। पुरु ने सिकंदर को उस मार्ग से जाने को मना कर दिया जिससे वह आया था। और अपने प्रदेश से दक्खिन की और से जाने का मार्ग दिया।
जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था,उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया।इसी लूट को भारतीय इतिहास में सिकंदर की दक्खिन की और की विजय लिख दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया।इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया।
प्लुतार्च लिखता है कि,"भारत में सबसे अधिक खुन्कार लड़ाकू जाती मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े टुकड़े होने ही वाले थे,---------------उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे।और सिकंदर को बुरी तरह से आहात कर दिया।शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया।सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया।"
इसी भरी markat में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की lathi का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके अन्ग्रक्षक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए। भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मोत का कारण बन गया।
अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने में उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा,और ज्वर से पीड़ित हो गया। तथा कुछ दिन बाद उसी ज्वर ने उसकी जान ले ली।
स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नही जीत पाया । परंतू पुरु से इतनी मार खाने के बाद भी इतिहास में जोड़ दिया गया कि सिकंदर ने पुरु पर जीत हासिल की।भारत में भी महान राजा पुरु की जीत को पुरु की हार ही बताया जाता है।यूनान सिकंदर को महान कह सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सिकंदर को नही बल्कि उस पुरु को महान लिखना चाहिए जिन्होंने एक विदेशी आक्रान्ता का मानमर्दन किया।

Tuesday, October 30, 2012

क्या ये मुगलिस्तान की तरफ़ पाकिस्तान के बढ़्ते कदम हैं.....


----शेयर करे मित्रो ताकि हर हिन्दुस्तानी जान सके-----
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घुसपैठियों की शरणस्थली-----
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पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद म्यांमार के हजारों अवैध घुसपैठियों को दिल्ली से बाहर निकालना संभव हुआ, जिन्हें दिल्ली
पुलिस ने वसंत कुंज के समीप सुल्तानगढ़ी में शरण लेने की अनुमति दी थी, किंतु सरकार ने उन्हें देश से निकालने की अब तक कोई घोषणा नहीं की है। सेक्युलर दलों के सहयोग से देश में अब भी करीब डेढ़ करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठिए न केवल सुरक्षित जिंदगी गुजार रहे हैं, बल्कि राशन कार्ड, मतदाता कार्ड बनवाने में भी सफल हो रहे हैं।

इसलिए रोहयांग म्यांमारी घुसपैठियों की भारत में स्थायी रूप से बसने की आशंका निराधार नहीं है। रोहयांग म्यांमारी बांग्लादेश के चटगांव में हजारोंबौद्ध चकमाओं के नरसंहार के अपराधी हैं, जिन्हें बांग्लादेश और म्यांमार, दोनों ने इस जघन्य कांड के लिए खदेड़ भगाया है। रोहयांग म्यांमारी नागरिक पिछले दिनों हजारों की संख्या में दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर के सामने एकत्रित हुए और उससे भारत में शरणार्थी का दर्जा दिलाने की मांग की।

भारत को रक्तरंजित करने में लगे विभिन्न आतंकी संगठनों के खिलाफ एक सशक्त व मजबूत एनसीटीसी नामक एजेंसी का प्रस्ताव लाकर केंद्र सरकार राज्य सरकारों से रार ठाने बैठी है। मैंने पिछले दिनों राज्यसभा में यह मामला उठाया था और सरकार से जानना चाहा था कि आखिर बिना वीजा ये लोगदिल्ली कैसे धमक आए? उन्हें संरक्षण और समर्थन देने वाले कौन से व्यक्ति या संगठन हैं?

इन सवालों का सरकार के पास कोई जवाब नहीं था। हैदराबाद, पंजाब, जम्मू, जलालाबाद, मेरठ, दिल्ली और खुर्जा में हजारों रोहयांग म्यांमारी अवैध रूप से आ बसे और सरकार को कोई जानकारी ही नहीं है। हजारों की संख्या में म्यांमार से चलकर यदि ये दिल्ली पहुंचे हैं तो किसने इतने बड़े वर्ग का नेतृत्व किया, किसने इनका वित्तपोषण किया और इन सबका समन्वय
आखिर किसने किया? गृहमंत्री ने खानापूर्ति के लिए जांच कराने की बात की, किंतु यह कैसी सरकार है, जो आतंकवाद से लड़ने के लिए अभूतपूर्व कारगर एजेंसी बनाने का दावा करती है और दूसरी ओर हजारों की संख्या में अवैध घुसपैठ की उसे जानकारी तक नहीं होती ?

क्या यह देश धर्मशाला है, जहां कभी बांग्लादेश से तो कभी म्यांमार से अवैध घुसपैठिए बेरोकटोक आ धमकते हैं और स्थानीय जनजीवन को अस्तव्यस्त करते हैं? क्या वोट बैंक की राजनीति के लिए इन अवैध घुसपैठियों को इसलिए शरणार्थी मान लेना चाहिए कि वे मजहब विशेष के हैं? रोहयांग म्यांमारी और बांग्लादेशी घुसपैठियों का भारत से दूर-दूर का संपर्क नहीं है, फिर भी उन्हें संरक्षण दिलाने के लिए सेक्युलर दलों का एक बड़ा तबका चिंताग्रस्त है,

किंतु उन हजारों हिंदुओं के लिए कोई फिक्रमंद दिखाई नहीं देता जो मजहबी चरमपंथ और हिंसा से खौफजदा होकर बांग्लादेश और पाकिस्तान से पलायन कर अपने वतन लौटे हैं। लाखों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में बेगानों की तरह शरणार्थी शिविरों में जीवनयापन कर रहे हैं, किंतु उनकी घरवापसी की चिंता नहीं होती। क्यों? क्या इसलिए कि वे हिंदू हैं?

देश का विभाजन मजहबी जुनून के कारण हुआ। बड़े पैमाने पर रक्तपात हुआ। पाकिस्तान ने खुद को इस्लामी राष्ट्र के रूप में स्थापित कर लिया। 11 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की संसद के माध्यम से यह भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक बराबरी के अधिकार सेसुरक्षित रहेंगे, किंतु उनके देहावसान से वह सपना ही रह गया। इसके बाद 1950 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच एक संधि हुई। इसमें भी भरोसा दिलाया गया कि विभाजन के बाद दोनों देश अपने-अपने अल्पसंख्यकों का विशेष ख्याल रखेंगे, किंतु आज स्थिति कैसी है?

भारत अपनी पंथनिरपेक्ष परंपरा के अनुसार सेक्युलर राष्ट्र है, जहां मुसलमानों को न केवल बहुसंख्यकों के बराबर अधिकार प्राप्त हैं, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के कारण प्राय: सभी सेक्युलर दलों में उन्हें ज्यादा से च्यादा विशेषाधिकार, रियायतें और सुविधाएं दिलाने की होड़ लगी रहती है। वहीं पाकिस्तान में हिंदू और ईसाइयों की क्या स्थिति है ?

वहां उनके साथ तीसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार होता है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हर महीने अकेले सिंध प्रांत में 20-25 हिंदू लड़कियों के अगवा करने, उनका जबरन मतांतरण कराने के बाद उनका मुस्लिम लड़कों से निकाह कराने की घटनाएं सामने आती हैं। दिल्ली स्थित विदेशी क्षेत्रीय निबंधन कार्यालय के अनुसार पाकिस्तान से भारत आने
वाले हिंदुओं की संख्या पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़ी है।

हाल में रिंकल नामक एक हिंदू युवती के साथ जो हुआ वह पाकिस्तान में हिंदुओं की अवस्था को समझने के लिए काफी है। 26 मार्च को पाकिस्तानके मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के समक्ष सिंध में अपने परिजनों के साथ रहने वाली 19 वर्षीय रिंकल कुमारी ने नावेद शाह नामक व्यक्ति पर अपने अपहरण का आरोप लगाते हुए उसे अपनी मां के संरक्षण में देने की गुहार लगाई। कोर्ट से जब पुलिस उसे खींचकर ले जा रही थी |

तो उसने बिलखते हुए मीडियाकर्मियों से कहा कि उसका जबरन मतांतरण औरनिकाह कराया गया है, किंतु 18 अप्रैल को मामले की सुनवाई के लिए जब वह दोबारा सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं तो उसने स्वेच्छा से मतांतरण और नावेद से निकाह करने की बात कबूल कर ली। कारण? सुनवाई के वक्त हजारों की संख्या में बंदूकधारियों का जमा होना। ऐसी अनेक रिंकलों की कहानी राजस्थान, गुजरात और पंजाब में शरणागत हिंदू परिवारों के सीनों में पैबस्त हैं, लेकिन जो स्वयंभू सेक्युलर दल पाकिस्तान के हिंदुओं के उत्पीड़न पर खामोश रहते हैं।
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[लेखक-बलबीर पुंज: ]

Thursday, July 26, 2012

सोनिया गाँधी की पूरी असली हिस्ट्री .....जरुर देखे...........


सोनिया गाँधी की पूरी असली हिस्ट्री .....जरुर देखे...........


सोनिया माइनो गांधी. भारत की सबसे ताकतवर महिला शासक जिसके प्रत्यक्ष हाथ में सत्ता भले ही न हो लेकिन जो एक सत्ताधारी पार्टी की सर्वेसर्वा हैं. जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी लंबे अरसे से सोनिया गांधी के बारे में ऐसे आश्चर्यजनक बयान देते रहे हैं जिसपर सहसा यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन अब जैसे जैसे समय बीत रहा है सोनिया गांधी का सच और सुब्रमण्यम स्वामी के बयान की दूरियां घटती दिखाई दे रही हैं. सोनिया गांधी के बारे में खुद सुब्रमण्यम स्वामी का यह लेख-
तीन झूठ:
(पहला ) कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं, वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है, जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है।
 (दूसरा झूठ)सोनिया से जुड़ा दूसरा झूठ है उनके पिता का नाम। अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे विश्व युद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं, जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था, सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे। लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता।
(तीसरा झूठ ) सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी , जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है , जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। ये सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। इस तरह ये सोनिया गांधी के तीन झूठ हैं, जो उन्होंने छिपाने की कोशिश की। कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय कारणों से भारतीयों को बेवकूफ बनाने के लिए उन्होंने ये सब किया। इन सबके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। अब हमें उनके बारे में और कुछ भी जानने की जरूरत है।
सोनिया का भारत में पदार्पण:
सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आये। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे , लेकिन वो लंबे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। स्वाभावित तौर पर सोनिया इस नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन फंड कर सकें। राजीव मां इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर 1965 में  गुस्सा जाहिर किया था,  श्रीमती इंदिरा गांधी ने सुब्रमन्यम को ब्रेंनेडिस यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में , जहां वो ठहरी थीं , व्यक्तिगत तौर पर चाय के लिए आमंत्रित किया। पीएन लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से अनुरोध किया था , जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और खासा पैसा उड़ा रहे थे और कर्ज में डूबे हुए थे। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं, उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी एन कौल ने इसके लिए उन्हें कंविंस किया , उन्होंने इंदिरा जी से कहा था कि ये शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद इंटरेस्ट में बेहतर कदम साबित हो सकती है। कौल ने भी तभी ऐसा किया जब सोवियत संघ ने उनसे ऐसा करने को कहा।
सोनिया के केजीबी कनेक्शन:
बताया जाता है कि सोनिया के पिता के सोवियत समर्थक होने के बाद से सोवियत संघ का संरक्षण सोनिया और उनके परिवार को मिलता रहा। जब एक प्रधानमंत्री का पुत्र लंदन में एक लड़की के साथ डेटिंग कर रहा था , केजीबी जो भारत और सोवियत रिश्तों की खासा परवाह करती थी , ने अपनी नजर इस पर लगा दी , ये स्वाभाविक भी था , तब उन्हें पता लगा कि ये तो स्टेफनो की बेटी है , जो उनका इटली का पुराना विश्वस्त सूत्र है। इस तरह केजीबी ने इस शादी को हरी झंडी दे दी। इससे पता चलता है कि केजीबी श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में कितने अंदर तक घुसा हुआ था। राजीव और सोनिया के रिश्ते सोवियत संघ के हित में भी थे , इसलिए उन्होंने इस पर काम भी किया। राजीव की शादी के बाद मैनो परिवार को सोवियत रिश्तों से खासा फायदा भी हुआ। भारत के साथ सभी तरह सोवियत सौदों , जिसमें रक्षा सौदे भी शामिल थे , से उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम मिलती रही। एक प्रतिष्ठित स्विस मैगजीन स्विट्जर इलेस्ट्रेटेड के अनुसार राजीव गांधी के स्विस बैंक अकाउंट में दो बिलियन पाउंड जमा थे , जो बाद में सोनिया के नाम हो गये। डॉ. येवगेनी अलबैट (पीएचडी , हार्वर्ड) जाने माने रूसी स्कॉलर और जर्नलिस्ट हैं और वो अगस्त 1981 में राष्ट्रपति येल्तिसिन द्वारा बनाये गये केजीबी कमीशन के सद्स्यों में भी थीं। उन्होंने तमाम केजीबी की गोपनीय फाइलें देखीं , जिसमें सौदों से संबंधित फाइलें भी थीं। उन्होंने अपनी किताब द स्टेट विदइन स्टेट – केजीबी इन द सोवियत यूनियन में उन्होंने इस तरह की गोपनीय बातों के रिफरेंस नंबर तक दे दिये हैं , जिसे किसी भी भारतीय सरकार द्वारा क्रेमलिन से औपचारिक अनुरोध पर देखा जा सकता है। रूसी सरकार की 1982 में अल्बैटस से मीडिया के सामने ये सब जाहिर करने पर भिङत भी हुई। उनकी बातों की सत्यता की पुष्टि रूस के आधिकारिक प्रवक्ता ने भी की। (ये हिन्दू 1982 में प्रकाशित हुई थी)। प्रवक्ता ने इन वित्तीय भुगतानों की पैरवी करते हुए कहा था कि सोवियत हितों की दृष्टि से ये जरूरी थे। इन भुगतानों में कुछ हिस्सा मैनो परिवार के पास गया , जिससे उन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावों में भी फंडिंग की। 1981 में जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो चीजें श्रीमती सोनिया गांधी के लिए बदल गईं। उनका संरक्षक देश 16 देशों में बंट गया। अब रूस वित्तीय रूप से खोखला हो चुका था और अव्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और किसी और कम्युनिस्ट देश के करीब हो गईं , जो रूस का विरोधी है। रूस के मौजूदा प्रधानमंत्री और इससे पहले वहां के राष्ट्रपति रहे पुतिन एक जमाने में केजीबी के बड़े अधिकारी थे। जब डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो रूस ने अपने करियर डिप्लोमेट राजदूत को नई दिल्ली से वापस बुला लिया और तुरंत उसके पद पर नये राजदूत को तैनात किया , जो नई दिल्ली में 1960 के दशक में केजीबी का स्टेशन चीफ हुआ करता था। इस मामले में डॉ. अल्बैट्स का रहस्योदघाटन समझ में आता है कि नया राजदूत सोनिया के केजीबी के संपर्कों के बारे में बेहतर तरीके से जानता था। वो सोनिया से स्थानीय संपर्क का काम कर सकता था। नई सरकार सोनिया के इशारों पर ही चलती है और उनके जरिए आने वाली रूसी मांगों को अनदेखा भी नहीं कर सकती। क्या इससे ये नहीं लगता कि ये भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक भी हो सकता है। वर्ष 2001 में सुब्रमन्यम    ने  दिल्ली में एक रिट याचिका दायर की , जिसमें केजीबी डाक्यूमेंट्स की फोटोकापियां भी थीं और इसमें उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी लेकिन वाजपेई सरकार ने इसे खारिज कर दिया। इससे पहले सीबीआई महकमे को देखने वाली गृह राज्य मंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने मेरे 3 मार्च 2001 के पत्र पर सीबीआई जांच का आदेश भी दे दिया था लेकिन इस मामले पर सोनिया और उनकी पार्टी ने संसद की कार्रवाई रोक दी। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेई ने वसुधरा की जांच के आदेश को खारिज कर दिया। मई 2002 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि वो रूस से मालूम करे कि सत्यता क्या है , रुसियों ने ऐसी किसी पूछताछ का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन सवाल ये है कि किसने सीबीआई को इस मामले पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था। वाजपेई सरकार ने , लेकिन क्यों ? इसकी भी एक कहानी है। अब सोनिया ड्राइविंग सीट पर हैं और सीबीआई की स्वायत्ता लगभग खत्म सी हो चुकी है
सोनिया और भारत के कानूनों का हनन:
सोनिया के राजीव से शादी के बाद वह और उनकी इतालवी परिवार को उनके दोस्त और स्नैम प्रोगैती के नई दिल्ली स्थित प्रतिनिधि आटोवियो क्वात्रोची से मदद मिली। देखते ही देखते मैनो परिवार इटली में गरीबी से उठकर बिलियोनायर हो गया। ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसे छोड़ा गया। 19 नवंबर 1964 को नये सांसद के तौर पर मैंने प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी से संसद में पूछा क्या उनकी बहू पब्लिक सेक्टर की इंश्योरेंस के लिए इंश्योरेंस एजेंट का काम करती है (ओरिएंट फायर एंड इंश्योरेंस) और वो भी प्रधानमंत्री हाउस के पते पर और उसके जरिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके पीएमओ के अधिकारियों का इंश्योरेंस करती हैं। जबकि वो अभी इतालवी नागरिक ही हैं (ये फेरा के उल्लंघन का मामला भी था) । संसद में हंगामा हो गया। कुछ दिनों बाद एक लिखित जवाब में उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा हां ऐसा हुआ था और ऐसा गलती से हुआ था लेकिन अब सोनिया गांधी ने इंश्योरेंस कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। जनवरी 1970 में श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं और सोनिया ने पहला काम किया और ये था खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराने का। ये नियमों और कानूनों का सरासर उल्लंघन था। इस आधार पर उनका वीसा भी रद्द किया जा सकता था तब तक वो इतालवी नागरिक के रूप में कागजों में दर्ज थीं। जब मीडिया ने इस पर हल्ला मचाया तो मुख्य निर्वाचक अधिकारी ने उनका नाम 1972 में डिलीट कर दिया। लेकिन जनवरी 1973 में उन्होंने फिर से खुद को एक वोटर के रूप में दर्ज कराया जबकि वो अभी भी विदेशी ही थीं और उन्होंने पहली बार भारतीय नागरिकता के लिए अप्रैल 1973 में आवेदन किया था।
सोनिया गांधी आधुनिक रॉबर्ट क्लाइव:
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी भारतीय कानूनों का सम्मान नहीं करतीं। अगर कभी उन्हें किसी मामले में गलत पाया गया या कठघरे में खडा किया गया तो वो हमेशा इटली भाग सकती हैं। पेरू में राष्ट्रपति फूजीमोरी जो खुद को पेरू में पैदा हुआ बताते थे , जब भ्रष्टाचार के मामले में फंसे और उन पर अभियोग चलने लगा तो वो जापान भाग गये और जापानी नागरिकता के लिए दावा पेश कर दिया। 1977 में जब जनता पार्टी ने चुनावों में कांग्रेस को हराया और नई सरकार बनाई तो सोनिया अपने दोनों बच्चों के साथ नई दिल्ली के इतालवी दूतावास में भाग गईं और वहीं छिपी रहीं यहां तक की इस मौके पर उन्होंने इंदिरा गांधी को भी उस समय छोड़ दिया। ये बात अब कोई नई नहीं है बल्कि कई बार प्रकाशित भी हो चुकी है। राजीव गांधी उन दिनों सरकारी कर्मचारी (इंडियन एयरलाइंस में पायलट) थे। लेकिन वो भी सोनिया के साथ इस विदेशी दूतावास में छिपने के लिए चले गये। ये था सोनिया का उन पर प्रभाव। राजीव 1978 में सोनिया के प्रभाव से बाहर निकल चुके थे लेकिन जब तक वो स्थितियों को समझ पाते तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी। जो लोग राजीव के करीबी हैं , वो जानते हैं कि वो 1981 के चुनावों के बाद सोनिया को लेकर कोई सही कदम उठाने वाले थे। उन्होंने सभी प्रकार के वित्तीय घोटालों और 197८ के चुनावों में हार के लिए सोनिया को जिम्मेदार माना था। मैं तो ये भी मानता हूं कि सोनिया के करीबी लोग राजीव से घृणा करते थे। इस बात का जवाब है कि राजीव के हत्यारों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मृत्युदंड के फैसले पर मर्सी पीटिशन की अपील राष्ट्रपति से की गई। ऐसा उन्होंने इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह के लिए क्यों नहीं किया या धनंजय चट्टोपाध्याय के लिए नहीं किया ? वो लोग जो भारत से प्यार नहीं करते वो ही भारत के खजाने को बाहर ले जाने का काम करते हैं, जैसा मुहम्मद गौरी, नादिर शाह और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने किया था। ये कोई सीक्रेट नहीं रह गया है। लेकिन सोनिया गांधी तो उससे भी आगे निकलती हुई लग रही हैं। वो भारतीय खजाने को जबरदस्त तरीके से लूटती हुई लग रही हैं।
जब इंदिरा गांधी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ जब क्रेट के क्रेट बहुमूल्य सामानों को बिना कस्टम जांच के नई दिल्ली या चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से रोम न भेजा गया हो। सामान ले जाने के लिए एयर इंडिया और अलीटालिया को चुना जाता था। इसमें एंटिक के सामान , बहुमूल्य मूर्तियां , शॉल्स, आभूषण , पेंटिंग्स , सिक्के और भी न जाने कितनी ही बहुमूल्य सामान होते थे। ये सामान इटली में सोनिया की बहन अनुष्का उर्फ अलेक्सांद्रो मैनो विंसी की रिवोल्टा की दुकान एटनिका और ओरबासानो की दुकान गणपति पर डिसप्ले किया जाता था। लेकिन यहां उनकी बिक्री ज्यादा नहीं थी इसलिए इसे लंदन भेजा जाने लगा और सोठेबी और क्रिस्टी के जरिए बेचा जाने लगा। इस कमाई का एक हिस्सा राहुल गांधी के वेस्टमिनिंस्टर बैंक और हांगकांग एंड शंघाई बैंक की लंदन स्थित शाखाओं में भी जमा किया गया। लेकिन ज्यादातर पैसा गांधी परिवार के लिए काइमन आइलैंड के बैंक आफ अमेरिका में है। राहुल जब हार्वर्ड में थे तो उनकी एक साल की फीस बैंक आफ अमेरिका काइमन आइलैंड से ही दी जाती थी। सुब्रमन्यम ने  वाजपेई सरकार को इस बारे में बार-बार बताया, लेकिन उन्हें विश्वास नही हुआ , तब सुब्रमन्यम ने  दिल्ली हाईकोर्ट में एक पीआईएल दायर की। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को इंटरपोल और इटली सरकार की मदद लेकर जांच करने को कहा। इंटरपोल ने इन दोनों दुकानों की एक पूरी रिपोर्ट तैयार करके सीबीआई को भी दी, जिसे कोर्ट ने सीबीआई से सुब्रमन्यम को दिखाने को भी कहा , लेकिन सीबीआई ने ऐसा कभी नहीं किया। सीबीआई का झूठ तब भी अदालत में सबके सामने आ चुका था जब उसने अलेक्सांद्रो मैनो का नाम एक आदमी का बताया और विया बेलिनी 14 , ओरबासानो को एक गांव का नाम बताया था जबकि ये मैनो के निवास की स्ट्रीट का पता था। अलबत्ता सीबीआई के वकील द्वारा इस गलती के लिए अदालत के सामने खेद जाहिर करना था लेकिन उसे नई सरकार द्वारा एडिशिनल सॉलिसीटर जनरल के पद पर प्रोमोट कर दिया गया।
एकदम ताजा मामला 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ा हुआ है। पौने दो लाख करोड के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 60 हजार करोड रुपए घूस बांटी गई जिसमें चार लोग हिस्सेदार थे। इस घूस में सोनिया गांधी की दो बहनों का हिस्सा 30-30 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री सब कुछ जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहे। इस घोटाले में घूस के तौर पर बांटे गए 60 हजार करोड़ रुपये का दस प्रतिशत हिस्सा पूर्व संचार मंत्री ए राजा को गया। 30 फीसदी हिस्सेदारी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि को और 30-30 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी की दो बहनों नाडिया और अनुष्का को गया है। शेयर जरुर करे ........
 सुब्रमण्यम स्वामी से प्राप्त सुचना के आधार पर.....................

Saturday, July 21, 2012

इस्पात(स्टील) बनाना भारत ने सिखाया


इस्पात(स्टील) बनाना भारत ने सिखाया और आप जानते है कि ये एक बड़ी तकनीकी का काम है। एक अयस्क लोहे से मनचाहा स्टील या इस्पात बनाना भारत ने दुनिया को सिखाया और ये तकनीकी इस देश में आज की नही है बहुत साल पहले की विकसित की गयी है।
एक अंग्रेज़ आया हमारे भारत में १७९५ में उसने एक सर्वेक्स्ण किया। उस अंग्रेज के कुछ वाक्या सुनाता हूं। अंग्रेजी में उसने लिखा में आपको हिंदी में बताता हूं,
उसने लिखा की भारत में इस्पात बनाने का काम पिछले १५०० साल से हो रहा है। तो एक हिसाब लगाओ कि १८०० ई० में १५०० साल घटा दो तो लगभग तीसरी सदी से इस देश में इस्पात बनाने का काम हो रहा है।
मैने जो सर्वेक्स्ण किया है वो भारत के पस्चिमी, पूर्वी और थोड़ा सा ड्क्शिण इलाके का किया तो मैने इनमे १५००० छोटे कारखाने देखें हैं। मतलब small enterpreneurship का बेतोड़ नमूना था। आगे सुनो वो कहता है कि एक दिन में अगर एक कारखाने का उत्पादन करीबन ५०० किलो तक है और हरएक कारखाना २४ घंटे चलता है। उसमें मज्दूरों की तीन तीन पालियां हैं। जो सबसे महत्तवपूर्ण उपकर्ण जो है- भट्टी लोहा गलाने के लिये इस्तेमाल की जा रही है जिसे हम आजकल blast furnace कहते हैं, ये तो एक बात अब सुनो कि जो उस ब्लास्ट फ़रनेस बनाने की कीमत है वो १५ रुपय हैं और ये आकणा उसी समय का है।
एक टन स्टील बनाने का खर्चा ८० रुपय है तो एक किलो स्टील बनाने का खर्चा ८० पैसे। आज एक किलो स्टील की कीमत क्या है??? ४०-८० रुपेय तो बात ये है कि जब हम अपने भारतीय तरीके से बनाते थे तो वो ८० पैसे थे और अब जब यूरोपियन तरीके से बनाते हैं तो कीमत ५० रुपेय हो गयी तो करीबन ८२ गुना की बढ़ोत्री??
एक बात और वो कहता है कि भारत का स्टील उस समय निर्यात प्रीमियम दामों पर होता था मतलब सबसे महंगा बिकता था??
अंत में वो लिखता है कि अगर भारत के व्यापारी उस स्टील के बदले में सोना भी मांगे तो खरीदार देदे.... वो इसलिये कह रहा है क्योंकि भारत ही में एसा स्टील बनता है जो जिसमें जंग नही लगता। इसका उदाहर्ण किसी से छुपा नही है भैया नही देखा तो जाके लोह स्तंब देख आयो वो भारतीय स्टील का बेजोड़ उदाहरण हैं खुल्ले में बर्सों से खड़ा है अब तक जंग नही लगा।

ऐसा नही है कि एसा स्टील और कहीं बनता ही नही था स्वेडन मे बनता था। पर यहां ८० रुपय का था और वहां ८०००० रुपय की लागत पे बनता था??
एक बात और है जो उसने कही की भारत की जो भट्टी है वो इतनी हलकी है कि उसे बैलगाड़ी मे रख कर कहीं भी असानी से ले जाया जा सकता है।

तो आज से ऐसा कहना छोड़ो की हमे कुछ नही पता हम तो शुरु से ही कमजोर थे कोई तकनीकी नही थी, कुछ नही था, बंजारे थे अरे हमारे पूर्वज तो गुरू थे पूरे विश्व के??

"अंग्रेजों ने टीका लगाना भारत से सीखा"


आपको आज एक तथ्य बताता हूं धर्य और ध्यान से पढ़ें १७१० के समय में एक अंग्रेज़ भारत आया था। उसका नाम था डा० ओलीवर ये भारत में आके कलकत्ता शहर में आया बंगाल घूमा और सब घूम घाम के इसने एक डायरी लिखी। उस डायरी के एक पन्ने का एक छंद सुनाता हूं आपको...
वो ये कह्ता है, कि मैने भारत में आकर पहली बार देखा की चेचक जैसी महामारी को कितनी आसानी के साथ भारत वासी ठीक कर लेते हैं। आपको मालूम है १७वी सतावदी में पूरे विश्व में एक महामारी फ़ैली थी, पूरे विश्व भर में इलाज़ नही था। अफ़रीका में लेटिन अमेरीका में लाखों लोग मर गये थे इसके कारण ये महामारी थी बिमारी नही थी।
अब उस डा० ने क्या देखा की भारतवासी इस बीमारी से लड़्ने के लिये टीका लगाते थे और वो कहता है की मैने दूनिया में पहली बार देखा डा० होते हुए। डा० ओलीवर एक बहुत बड़ा नाम है इंगलैण्ड में देखो गूगल करके।
तो वो अपनी डायरी में लिखता है कि उस समय भारतवर्श मे चेचक की बिमारी सबसे कम है क्योंकी टीका लगता था। अब टीका लगाने का तरीका क्या है। टीका जो लगता था एक सुई जैसी वस्तू से लगता था जिसके बाद थोड़ा सा ज्वर होता था और तीन दिन में आदमी के शरीर में चेचक से लड़ने की प्रतीरोधक शक्ती मिल जाती थी। ए बार टीका जिसने ले लिया जिंदगी भर के लिये वो चेचक से मुक्त हो गया।

तो अब मेरी लिखी बात पे आप गर्व करना की.......
"अंग्रेजों ने टीका लगाना भारत से सीखा"

Monday, July 16, 2012

युवाओं के चारित्रिक पतन

एक काम हम सबको शुरू करना है, हमारे समाज और फिल्मों में सरकार द्वारा परोसी जा रही अश्लीलता को समाप्त करना....जब तक सन्नी लियोन जैसी वैश्यायों को भारत सरकार कोई फिल्म बनाने की छूट देती रहेगी तब तक मुझे लगता है कि यह गुवाहाटी जैसी घटनाओं का रुकना असंभव है। 


हमारे देश के युवाओं के चारित्रिक पतन में अगर किसी का सबसे बड़ा दोष है तो वह है हमारी फिल्मों और टी.वी.कार्यक्रमों में बढ़ रही अश्लीलता का...अभी तक तो फिल्मों में होने वाली घटनाएं या द्रश्य सिर्फ खतरनाक थीं, पर अब तो हमारे युवायों और छोटे-छोटे बच्चों का सर्वनाश होने जा रहा है...क्यूँकी कनाडा की एक वेश्या को फिल्म बनाने की छूट भारत सरकार ने दे दी है। इस वेश्या की फिल्म जिस्म-२ जल्द ही हमारे सिनेमाघरों में आने वाली है, उसका नतीजा यह होने वाला है कि कोई भी बच्चा या युवा सबसे पहले इस वेश्या के बारे में जानने की कोशिश करेगा और कहीं से उसने इन्टरनेट खोल लिया तो उसके जीवन का कबाडा करने वाली है यह सन्नी लियोन।

आओ, हम सब नव भारत के क्रांतिकारी जो देश की अनेक बुराइयों के खिलाफ लड़ रहे हैं वे सब इस लड़ाई की शुरुआत भी करें.....जितना संभव हो सके जिस्म-२ और इस वेश्या का विरोध करें। हम चाहें तो उच्चतम न्यायालय में इस फिल्म की रिलीज़ पर प्रतिबन्ध लगाने की एक याचिका भी डाल सकते हैं। समय हमारे पास बहुत कम है और अगर एक बार इस वैश्या का प्रवेश भारतीय फिल्मों में हो गया तो हमारे छोटे भाई-बहनों और लाखों युवायों के चारित्रिक पतन को रोकना असंभव सा हो जाएगा। क्या दुर्दशा उनके चरित्र की होने वाली है..वो बयाँ करना बड़ा मुश्किल है ?

इससे पहले कि हमारे छोटे भाई- बहनों के साथ यह आघात हो, अधिक से अधिक संख्या में एकजुट होकर विरोध करें और सेंसर बोर्ड को दिखला दें कि आप जो कुछ परोसेंगे वो हम ऐसे ही स्वीकार नहीं करने वाले। हम सब ऋषि-मुनियों के वंसज हैं। हम भूखे रहकर मरना पसंद करते हैं लेकिन अपनी संस्कृति, सभ्यता और अपना चरित्र खोकर अमीर बनना नहीं।

आपसे विनम्रतापूर्वक निवेदन कि जरूर विरोध करें और सेंसर बोर्ड तक हमारी बातों को पहुंचाने में अपना सहयोग दें...ऐसी राक्षसी ताकतों से लड़ने के लिए हम सब को एकजुट होना होगा....आपसे सहयोग अपेक्षित है।

वंदे मातरम्